आंबेडकरवादियो पर सवाल: दीक्षाभूमि की शपथ भूल गए क्या? क्यों झूके बागेश्वर बाबा के सामने?
नागपूर (विजय खवसे )- नागपुर की पवित्र भूमि दीक्षाभूमि, जहां डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी, आज फिर चर्चा के केंद्र में है। उस ऐतिहासिक दिन दी गई 22 प्रतिज्ञाएं केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, समानता और वैज्ञानिक सोच की शपथ थीं।

लेकिन हाल ही में सामने आई कुछ घटनाओं ने समाज के भीतर गहरी नाराजगी पैदा कर दी है। खुद को बौद्ध विचारधारा से जोड़ने वाले, खुद को बौद्ध समझने वाले कुछ प्रमुख चेहर जिनमें पूर्व न्यायाधीश भूषण गवई का नाम भी लिया जा रहा है,और एक नागपूर का चर्चित चेहरा जो गले बुद्ध और हात में बाबासाहब की तस्वीर लेकर चलनेवाला “डॉली” कि टपरी चाय वाला द्वारा धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (बागेश्वर बाबा) के सामने झुकने की तस्वीरें और खबरें सामने आने के बाद बहस तेज हो गई है।अब इन लोगो को क्या कहेंगे?
समाज का एक वर्ग इसे केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं, बल्कि आंबेडकरवादी मूल्यों से विचलन मान रहा है। लोगों का कहना है कि जिस विचारधारा ने उन्हें पहचान, सम्मान और अधिकार दिलाए, उसी के मूल सिद्धांतों—विशेषकर अंधविश्वास और ब्राह्मणवादी प्रथाओं से दूरी—को नजरअंदाज करना एक तरह से प्रतिज्ञाओं का उल्लंघन है।
दीक्षाभूमि से उठी वह चेतना आज भी यही सवाल पूछ रही है

क्या आंबेडकर से बड़ा कोई हो सकता है?
क्या आत्मसम्मान की शपथ केवल शब्दों तक सीमित रह गई है?
सोशल मीडिया और समाज के विभिन्न मंचों पर यह मुद्दा तेजी से उठ रहा है। कई आंबेडकरवादी संगठनों ने इसे “विचारधारा के साथ समझौता” बताया है, तो वहीं कुछ लोग इसे व्यक्ति की निजी आस्था कहकर बचाव भी कर रहे हैं।
फिलहाल एक बात साफ है—यह विवाद केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि विचार और प्रतिबद्धता की परीक्षा बन चुका है। दीक्षाभूमि की शपथ आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, और समाज उसी कसौटी पर अपने नेताओं और प्रतिनिधियों को परख रहा है।
