“मैं लाशों पर राजनीति करने नहीं आया, परिवारों के साथ खड़ा होने आया हूं” — अभिजीत दीपके बालाघाट के पत्रकारो के सवालोने मीडिया की मजाक उडाई!

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“मैं लाशों पर राजनीति करने नहीं आया, परिवारों के साथ खड़ा होने आया हूं” — अभिजीत दीपके

बालाघाट के पत्रकारो के सवालोने मीडिया की मजाक उडाई!

बालाघाट, मध्य प्रदेश | विजय बौद्ध की विशेष रिपोर्ट

बालाघाट जिले के आदिवासी बहुल क्षेत्र में आदिवासी बच्चों की मौत का मामला गंभीर बना हुआ है। इसी बीच सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके प्रभावित गांवों में पहुंचे और मृत बच्चों के परिजनों से मुलाकात कर क्षेत्र की स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए।

इसी दौरान कुछ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स द्वारा दीपके से तीखे सवाल किए जाने का मामला सामने आया। उनसे कथित तौर पर पूछा गया कि वे घटना के बाद अब तक क्यों नहीं पहुंचे और क्या वे बच्चों की मौत के मुद्दे पर राजनीति करने आए हैं?

इस पर दीपके ने कहा कि “मैं लाशों पर राजनीति करने नहीं आया, मैं उनके परिवार के साथ खड़ा होने आया हूं। मासूम बच्चों की मौत पर सवाल उठाना राजनीति नहीं, इंसानियत है।”

मुख्यमंत्री से पूछे जाने वाले सवाल मुझसे क्यों?-दिपके 

दीपके ने पत्रकारों के सवालों पर व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया देते हुए खुद को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री मानकर एक इस्तीफा पत्र जारी किया। उन्होंने लिखा कि वे तत्काल प्रभाव से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे रहे हैं और सरकार की स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी तथा आदिवासी क्षेत्रों की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए।

दीपके की ओर से जारी यह पत्र वास्तविक इस्तीफा नहीं, बल्कि पत्रकारों के सवालों पर राजनीतिक व्यंग्य के रूप में बताया गया है।

संपादक विजय बौद्ध ने उठाए पत्रकारिता की भूमिका पर सवाल

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर विजय बौद्ध, संपादक ‘द बुद्धिस्ट टाइम्स’, भोपाल, मध्य प्रदेश ने सवाल उठाए हैं।

विजय बौद्ध का आरोप है कि बालाघाट में दीपके के पहुंचने के बाद कुछ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स द्वारा उनसे जिस तरह के सवाल किए गए, उससे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे बच्चों की मौत के लिए जवाबदेही दीपके की हो। उनका कहना है कि यदि दीपके किसी सदन के सदस्य या मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं हैं, तो सरकार और प्रशासन से पूछे जाने वाले सवाल उनसे क्यों किए गए?

विजय बौद्ध ने यह भी आरोप लगाया कि भोपाल से कुछ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को बालाघाट भेजे जाने के पीछे दीपके की गतिविधियों को लेकर एक विशेष रणनीति हो सकती है। हालांकि, सरकार द्वारा इन इन्फ्लुएंसर्स को भेजे जाने के आरोप की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

स्थानीय पत्रकारों ने जताया विरोध

विजय बौद्ध के अनुसार, 13 सितंबर को अभिजीत दीपके के साथ कथित तौर पर किए गए व्यवहार के विरोध में 14 सितंबर को बालाघाट के कुछ स्थानीय पत्रकार और बुद्धिजीवी एकजुट हुए।

उनका आरोप है कि बाहरी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के कारण बालाघाट की स्थानीय पत्रकारिता की छवि प्रभावित करने का प्रयास किया गया। उन्होंने प्रशासन से पत्रकारों के साथ बेहतर समन्वय की मांग की और मामले में उचित कार्रवाई की मांग उठाई।

मूल सवाल अभी भी वही—32 बच्चों की मौत की जिम्मेदारी किसकी?

इस पूरे विवाद के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल बालाघाट में बच्चों की मौत के वास्तविक कारणों और प्रशासनिक जवाबदेही का है।

क्या प्रभावित आदिवासी क्षेत्रों में पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध थीं?
क्या मृत बच्चों को समय पर उपचार मिला?
क्या बीमारी, कुपोषण, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी या अन्य किसी कारण से मौतें हुईं?
और यदि प्रशासनिक लापरवाही सामने आती है, तो जिम्मेदारी किस अधिकारी या विभाग की होगी?

इन सवालों का अंतिम उत्तर सरकारी जांच, मेडिकल रिपोर्ट और न्यायिक प्रक्रिया से ही स्पष्ट हो सकता है।

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