नागपुर हाईकोर्ट में बाबासाहेब आंबेडकर की ऐतिहासिक जीत — आगमनदास फांसी प्रकरण!
वर्हाड मध्य प्रांत के छत्तीसगढ़ क्षेत्र में सतनामी पंथ के संत बाबा मुक्तावनदास उस दौर के बेहद सम्मानित और प्रभावशाली व्यक्तित्व थे। उनके भाई आगमनदास को एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश के तहत हत्या के मामले में फंसाया गया और रायपुर की अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुना दी। मामला गंभीर था और इसके पीछे राजनीतिक मंशा साफ दिखाई दे रही थी।
ऐसे समय में यह मामला बाबू हरदास के माध्यम से देश के महान विधिवेत्ता और समाज सुधारक भीमराव रामजी आंबेडकर तक पहुंचा। बाबू हरदास स्वयं नागपुर-कामठी क्षेत्र से मध्य प्रांतीय विधानसभा के सदस्य थे, जबकि आगमनदास भी 17 फरवरी 1937 को प्रांतिक काउंसिल के सदस्य चुने गए थे।
29 अप्रैल 1937 का दिन इस पूरे प्रकरण में ऐतिहासिक बन गया, जब बाबासाहेब आंबेडकर ने नागपुर हाईकोर्ट में आगमनदास की ओर से दमदार पैरवी की। उनकी कानूनी दलीलों और तथ्यपूर्ण प्रस्तुति के सामने आरोप टिक नहीं पाए और अंततः आगमनदास को फांसी से मुक्ति मिल गई। यह सिर्फ एक व्यक्ति की जीत नहीं थी, बल्कि न्याय और सत्य की बड़ी विजय थी।
उस दिन हाईकोर्ट परिसर में लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी। हर कोई बाबासाहेब की एक झलक पाने को उत्सुक था और जयजयकार के नारे गूंज रहे थे। लेकिन बाबासाहेब ने अनुशासन और मर्यादा का परिचय देते हुए स्पष्ट कहा—
“मैं यहां जयजयकार के लिए नहीं, बल्कि अदालत के काम से आया हूं। कृपया शांति बनाए रखें।”
उनके इस संदेश ने भीड़ को तुरंत शांत कर दिया। इसी दौरान बाबू हरदास ने घोषणा की कि अगले दिन 30 अप्रैल को कामठी में बाबासाहेब की एक सार्वजनिक सभा आयोजित होगी। यह भी उल्लेखनीय है कि “जय भीम” नारे के जनक के रूप में बाबू हरदास को माना जाता है।
आज इस ऐतिहासिक घटना को 89 वर्ष पूरे हो चुके हैं। नागपुर का वह पुराना हाईकोर्ट भवन, जहां यह ऐतिहासिक मुकदमा लड़ा गया था, आज भी संरक्षित है और इतिहास की गवाही देता है।
इसी गौरवशाली स्मृति को जीवंत रखने के लिए 29 अप्रैल 2026, बुधवार को सुबह 10 बजे पुराने हाईकोर्ट परिसर में बाबासाहेब को श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। इस कार्यक्रम का उद्देश्य फुले-शाहू-आंबेडकरी विचारधारा से जुड़े कार्यकर्ताओं और कानून के विद्यार्थियों को प्रेरित करना है।
उत्तम शेवडे
मीडिया प्रभारी, महाराष्ट्र प्रदेश बसपा
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