जंगल की भाषा समझने वाले ‘अरण्य ऋषि’ नहीं रहे

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लगभग 65 साल तक जंगलों में इधर से उधर घूमते रहे
नागपुर.
अरण्य ऋषि (वन) के नाम से प्रख्यात मारुति चितमपल्ली नहीं रहे। सोलापुर में 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया। नागपुर से उनका गहरा नाता रहा। यहां के अंबाझरी जैव विविधता पार्क का नाम मारुति चितमपल्ली के नाम पर रखने की मांग उठी थी। हालांकि वन विभाग इस संदर्भ में कदम नहीं उठा सका और जीते जी आस अधूरी रह गई। यहां तक कि शरीर के साथ न देने और अकेलेपन के कारण उन्हें 88 साल की उम्र में नागपुर छोड़ना पड़ा। पत्नी और बेटी की मौत के बाद वे अकेले हो गए थे। लगभग 65 साल तक जंगलों की भाषा समझने के लिए वे इधर से उधर घूमते रहे। प्राणी-कोश, वृष-कोश के लिए उन्होंने अथक प्रयास किया। वर्धा स्थित हिंदी विश्वविद्यालय ने उनका साथ दिया। रहने की व्यवस्था की। तीन महीने के लिए वर्धा गए चितमपल्ली तीन साल तक वहीं रहे। उन्होंने वहां एक ऐतिहासिक विश्वकोश बनाया।

जंगल में मंगल ढूंढते रहे
उनका जन्म 5 नवंबर 1932 को महाराष्ट्र के सोलापुर में हुआ था। उन्होंने दयानंद कॉलेज, सोलापुर से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और कोयंबटूर फॉरेस्ट कॉलेज से वानिकी का व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होंने महाराष्ट्र वन विभाग में 36 वर्षों से अधिक समय तक सेवा की। इस दौरान, उन्होंने कर्नाला पक्षी अभयारण्य, नवेगांव राष्ट्रीय उद्यान, नागझिरा अभयारण्य और मेलघाट टाइगर रिजर्व जैसे कई वन्यजीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वह 1990 में उप वन संरक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए। चितमपल्ली ने मराठी में प्रकृति और वन्यजीवों पर 25 से अधिक पुस्तकें लिखीं। उनके लेखन में पक्षियों, जानवरों, जंगलों और जनजातीय जीवन का सजीव वर्णन मिलता है। उनके कुछ प्रमुख कार्यों में “चकवाचांदण: एक वनोपनिषद” (आत्मकथा), “पक्षी जाय दिगंतरा”, “मृगपक्षीशास्त्र”, “रातवा”, “रानवाटा” और “शब्दांचं धन” शामिल हैं।

18 भाषाओं के जानकार थे
वे 18 भाषाओं के जानकार थे, जिनमें मराठी, संस्कृत, जर्मन और रूसी शामिल हैं। उन्होंने जनजातीय भाषाओं और बोलियों का भी गहरा अध्ययन किया। उन्हें उनके साहित्यिक और पर्यावरणीय संरक्षण के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। यह शोकांतिका रही कि विदर्भ के जंगलों की वनसंपदा व समृद्धि को दुनिया के सामने लाने वाले वनवासी तपस्वी चितमपल्ली को अपने अंतिम समय में वनविभाग का ही सहयोग नहीं मिला। वन विभाग की ही उदासीनता के कारण उन्हें पद्मश्री मिलते मिलते रहा। हालांकि बाद में उन्हें यह सम्मान मिला। 30 अप्रैल 2025 को महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के हाथों उन्हें पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया।

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